♢ समय के रंग ♢
-दिलीप कुमार अर्श
गुरु जी को खुद जीने की कला आती तो रग्घू आज सड़क पर धूल नहीं फांकता, वह भी आज जगह पर होता और आदमी कहलाता, ऐसा कहना है गांव की नई पीढ़ी का, जिसके लिए जीने की कला का मतलब है सिर्फ आगे बढ़ने की कलाबाजी यानी पैसा और चचकाचौंध, वह भी पुरुषार्थ की शून्य या न्यूनतम लागत पर।
तभी तो रग्घू अपने दिवंगत दादा को पानी पी -पीकर कोसता था जबकि उनकी शिष्य – पीढ़ी उन्हें एक गुणी, ज्ञानी और त्यागी गुरु जी के रूप में पूजती थी ।
गुणी – ज्ञानी ही नहीं, कुछ छिट – पुट चमत्कारिक शक्तियों के स्वामी भी थे गुरु जी। इलाके भर में काला जादू करनेवाली वाली सक्खड़ डायन तो उनके नाम से पनाह मांगती थी।
वह अब भले ही नहीं रहे, उनकी जिंदगी और शख्सियत से जुड़ी हुई कहानियां खासकर उनकी शिष्य – बिरादरी में तो आज भी जिंदा हैं।
उनके चेले -चटियों को पढ़ -लिखकर नौकरी -चाकरी नहीं मिली तो क्या हुआ , गुरुजी ने जो भीतर में ज्ञान और मुंह में बोली दी थी, उसके बल पर वे जीविकोपार्जन के हरेक उपक्रम में, स्वावलंबन और स्वाभिमान का संतुलन बनाए रखने में जरूर कामयाब रहे । उनमें से दो -चार तो साहित्य, कला, धर्म – दर्शन के जानकार के रूप में भी उभरे। बगुलों की बस्ती में से शायद पहली बार कुछ हंस एक साथ उड़ निकले थे, यह कोई कम बड़ी बात नहीं थी।
यही नहीं, उनके काबिल चेलों के भी ज्ञान, साहस और आत्मविश्वास के कई रोचक नमूने कुछ लोग अभी भी बड़े गर्व और चाव से पेश करते हैं। एक बार रुपौली थाने के बड़ा बाबू को रामदेव बाबू ने अंग्रेजी में ऐसा डांटा था कि उनका पानी उतर गया था और बरसों तक पुलिस गांव में घुसने से कतराती रही थी। लोगों ने कहा था - आखिर चेला किसका है? एक शिष्य ने तो यजमानी पूजा – पाठ का बीड़ा भी उठा लिया था। बाकायदा आर्यसमाजी पद्धति से होनेवाले घरवास, मुंडन, विवाह या श्राद्ध आदि में जब दारो पंडीजी संस्कृत में धाराप्रवाह वेद – मंत्रोच्चार करते तो लोग कहते, “ इसे कहते हैं असली बराहमन, मछरखौका पंडी जी के जीभ पर क्या ऐसी सरस्वती कभी विराजेगी ? आदि -आदि । इसी तरह एक मौलवी साहब बाहर आकर गांव में उल्टी -सीधी उर्दू – फारसी हांक रहे थे, नारायण बाबू ने उसे सफीक मुखियाजी के सामने ही उर्दू – फारसी में ऐसा लपेटा कि वो दुबारा कभी बुलाने पर भी वापस नहीं आए। सभी ने कहा था - चेला किसका है ?
...तो ऐसे कई और नमूने, उनके शिष्यों के कारनामों के थे, जिन्हें सुन - सुनाकर लोग आज भी महेन्दर गुरूजी की महानता और योगदान का अंदाजा लगाते और उनके ज्ञान की भी सुविधानुसार मीमांसा करते। ज्ञान यह था कि जीवन में नौकरी, पैसा या धन -सम्पत्ति ही सब कुछ नहीं है, जीने की कला आनी चाहिए और वह आती है विद्या से, ज्ञान से, आचरण से, ...त्याग से।
कहते हैं, छोटी -सी चूक की वजह से उन्हें अष्ट सिद्धि – नौ निधि की प्राप्ति नहीं हो सकी, नहीं तो बाबा बिसुरात की तरह वह भी आज देवता बनकर मंदिर में विराजते। फिर एक बार बस देवता घोषित हो जाए तो आदमी सामूहिक आस्था का स्थायी वाहक हो जाता है और तब वह किसी का बेटा -पोता या बाप - दादा नहीं रह जाता।
लेकिन महेन्दर गुरूजी का पोता है रग्घू, इसे कौन झुठला सकता है ? उनके खानदान की एकमात्र निशानी, और गांव के एकमात्र कायस्थ -परिवार की इकलौती लौ, बदलती हवा के तेज थपेड़ों में भुकभुकाती हुई…!
वह छोटी – सी चूक क्या थी कि गुरुजी अवतारी पुरुष या देवता नहीं बन सके, गांव में शायद एक ही आदमी जानता था जो कम से कम रग्घू तो बिल्कुल नहीं था।
वह तो सिर्फ इतना जानता था कि गांव -समाज के लिए उसके दादा ने अपना सब कुछ लुटा दिया। अपनी जमीन-जायदाद का अधिकांश, सार्वजनिक भवनों के लिए दान में दे दिया ।
जो कुछ पांच बीघा खेत बचा था, उसे कोसी लील गयी। उसके पिता, दस कट्ठा डीह- वास को छोड़कर जो भी जमीन कोसी के उस पार बची थी, रग्घू के जन्म से पहले ही गांजा -अफीम में फूंक कर बैठ गए थे।
उस जमाने में जब गांधी जी टीकापट्टी आए थे तो गांव के एक निपट निरक्षर लेकिन जागरुक कार्यकर्ता की प्रार्थना पर, बापू ने इलाके के लिए एक बुनियादी स्कूल खोलने की मंजूरी दी थी। लेकिन जमीन देने की जब बात आई थी तो इलाके के जमीन- जगहवाले भी पीछे हट गए थे, तब रग्घू के दादा ने ही गोठ बस्ती में बिल्कुल सड़क से लगी, कुल चार एकड़ जमीन स्कूल के नाम लिख दी थी।
यही नहीं, गांव के पंचायत -भवन, पुस्तकालय और मंदिर, सभी रग्घू के दादा की जमीन पर बने हैं। लेकिन यहां के लोगों की आंखों में थोड़ा भी पानी नहीं । स्कूल की दीवार पर सिर्फ बापू और नेहरू – अंबेडकर की तस्वीरें हैं, गुरु जी की नहीं। रग्घू ने इस पर विद्यालय -समिति की मीटिंग में हो- हल्ला किया था तो समिति अध्यक्ष ने राजनीति में भावुकता घोलकर कहा था, “ गुरू जी तो हम सबके दिल में हैं रग्घू, दीवार पर बापू को ही टांग कर कौन -सा तीर मार लिए हैं हमलोग ?”
लेकिन जब कभी वह इस स्कूल के सामने से गुजरता, उसके कलेजे में जैसे हल जुतने लगता और उसके माथे की नसें गर्म होने लगतीं । पिछले ही महीने उसके ठीक बगल वाली जमीन पांच लाख रुपये कट्ठा के हिसाब से बिकी। पांच लाख रुपये कट्ठा ? ...चार बीघा ... अस्सी कट्ठा ...करोड़ .?.. दादा ने सचमुच हाथ काटकर दे दिया। सोचकर मगज की नसें फटने लगतीं, मगज गरम होने लगता ।
अब तो हरेक साल खासकर जून या जेठ महीने में रग्घू का मगज गरम हो जाता है फिर बारिश गिरने तक गर्म ही रहता है।
दरअसल मां के गुजरने के बाद वह बिलकुल अकेला रह गया था। मामा लोग बुलाते थे लेकिन उसके इस बुलावे में उसे लोभ -लालच की बू आती थी। रग्घू की बची -खुची जमीन पर सबकी गीध- दृष्टि थी। यद्यपि वह अब सिर्फ डीह वास का मालिक था लेकिन एक उम्मीद यह भी बनी रहती थी कि कभी न कभी वह पांच बीघा जमीन कोसी के पेट से जरूर बाहर निकलेगी।
…और इस बार कोसी -बाढ की वापसी के बाद गांव के कई घर – परिवारों की डूबी जमीन उतरा ही गयी । जमीन की पहचान और दखल को लेकर पूरे इलाके में घमासान छिड़ा हुआ था। जोरू- जमीन जोर की...
ज़ोरू तो जो शादी के छह महीने के बाद ही अपने पिछले प्रेमी के साथ भाग गयी थी , कभी वापस नहीं आई लेकिन जमीन जरूर वापस आ गई थी, बस दखल में लाने के लिए जोर - आजमाइश में कूदना था।
रग्घू इस कुरुक्षेत्र में कहीं टिक न पाता अगर वार्ड -सदस्य जालो मंडल उसके साथ नहीं रहता। रग्घू की जान पर भी खतरा था। गांव में उसने सबको हिला – डुलाकर देख लिया था । उसने निराश होकर जालो से कहा था, “ सबके मन में लोभ है भाय”। लेकिन गांव में सिर्फ जालो भाय निर्लोभ हैं, ऐसा रग्घू को बार – बार लगता था। उसकी बदौलत ही पांच बीघा खेत रग्घू के दखल में आ पाया था। अब तो वह अक्सर उसी की मचान अगोरे रहता था। उसके कई ‘शुभचिंतकों’ ने एक बात गौर की थी , जब से उसका जालो मंडल के यहां आन – जान शुरू हुआ तभी से उसे गर्मीवाली बीमारी उखड़ी थी । पहले वह दिमागी रूप से बिल्कुल दुरुस्त था ।
उस रात जालो की बीवी ने कड़क मुर्ग – मसल्लम बनाया था। नये गेहूं की रोटी और देसी मुर्गी की गर्मी का विस्फोटक संयोग तो जवान अंतड़ी को भी हिलाकर रख देता है। रग्घू की अंतड़ी जितनी जवान थी उससे ज्यादा अतृप्त भूख की टूटी -मरी हुई, पर अति आतुर, सो महीनों बाद रोटी – मुर्गी के सामने...फिर सुबह से उल्टी और सीधी दोनों शुरू..
दूसरे दिन रात को ...जालो की बीवी ने देखा – रग्घू का हाथ -पैर ठार । जालो भी डर गया था। फोन कर मालपुर के झकसू डाक्टर को बुलाया... अपने घर के अंदर पर रग्घू को रात भर सलाइन चढ़वाई, जालो की घरवाली खाट के नीचे रात – भर जगी- बैठी रही थी और जालो घर के बाहर रात -भर पहरा देता रहा था कि रग्घू की तबीयत की खबर बाहर न फैले , नहीं तो एक गुन का दो गुन होते गांव में देर नहीं लगती।
लेकिन आजकल, अंदरूनी बातों को तेजी से फैलानेवाले अदृश्य विकिरण के सूक्ष्म सिग्नल दुर्भेद्य कंक्रीट की मोटी दीवारों को भी चीरकर बाहर उड़ते रहते हैं, यहां तो जालो के घर की ही दीवार थी ...टाट- मिट्टी की, वो भी जर्जर – ढहती... !
आखिर खबर बन ही गई ..उसी रात को रग्घू के पेट में गरमी बन गई थी और वही गर्मी हरेक साल मगज पर चढ़ जाती है, कुछ तो खिलाया है जालो की घरवाली ने।
नहीं, नहीं, ऐसा कुछ नहीं है, जालो की घरवाली तो मां समान है, बड़ी भाभी तो मां ही होती है न ? उस रात से रग्घू को उसके प्रति बड़ी श्रद्धा हो गयी थी।
उसी रात डॉक्टर झकसू ने सावधान करते हुए कहा था, “ रग्घू की देह का सब पानी निकल गया है, सलाइन से कुछ सुधार तो है, लेकिन धूप से इसे बचाकर रखना होगा, पेट की गर्मी थोड़ी मगज पर चढ़ गयी है , अगर चिंता – फिक्र या टेंशन बना रहा तो इसकी दिमागी हालत बिगड़ सकती है”।
जालो ने तीन दिन तक रग्घू को मचान से उतरने नहीं दिया था। उसकी घरवाली ने भरपूर सेवा की थी।
लोगों ने ताने भी कसे थे - अपने बुड्ढे ससुर को तो कलटाकर मार दिया, परजात के लिए इतना भाव – प्रेम ! कहीं कोसी वाली जमीन तो ...?
लेकिन रग्घू को भी पता नहीं था जालो की मचान पर वह उसकी अंतिम रात होगी । जालो ने देर रात तक जगकर उसे जो कुछ बातें बताईं, सुनकर रग्घू दंग रह गया, ...कान में देर तक झनझनाहट होती रही, पेट की भोंटी भी मथती रही । उन बातों के झूठ -सच होने का निर्णय करते वक्त वह कुछ देर तक सोचता रहा, “लेकिन जालो भाय झूठ क्यों बोलें ? आखिर वह पूरे गाँव को बदनाम क्यों करेंगे ?”
रग्घू को एकाएक गांव से नफरत हो गई, और उसे यह साफ – साफ दिखाई दे रहा था - यह गांव नहीं, लंका है यह, एक जालो भाय ही सही आदमी है, बांकी सब राक्षस हैं सचमुच!
जालो की बातों से इतना अपनापन और रस आ रहा था कि उन्हें सुनने के लिए रग्घू के रोम -रोम में जैसे कान उग आ रहे थे...तो स्कूल को चार बीघा जमीन गांववालों ने धमदाहा रजिस्ट्री आफिस में गुरुजी के नाम पर किसी और को खड़ा कर लिखवाया था। उस दिन वह गांव में नहीं थे। पन्द्रह – बीस दिन के लिए अपनी बहन के यहाँ गए थे।
स्कूल वाली जमीन के बारे में जब उन्हें पता चला था तो वह महीनों बीमार रहे। मरड़ की जालसाजी तो दबा दी गई लेकिन इलाके में दूर – दराज तक गुरु जी की दरियादिली, चर्चा का विषय बन गई और इस ‘त्याग’ का बड़ा नाम हुआ। फिर गांववालों ने उन्हें फूल – माला पहनाकर उनके हाथों स्कूल - भवन की नींव रखवाई तो गुरु जी का सारा दुख और मलाल जाता रहा।
पंचायत- भवन की जमीन के लिए तो मरड़ ने साफ – साफ कहा था, “ देखिए गुरु जी, आप तो हैं विद्वान् और ज्ञानी, हम मुरुख आपको क्या समझाएं ! आप हैं एक घर, शिक्षित और परहेजी परिवार, गांव- गराम खुश रहेगा तो आपका भी बाल – बच्चा भविष्य में खुश ही रहेगा। जमीन – जगह छोड़कर तो गांव से जाना है नहीं कहीं, सो..., बीच में ही गुरु जी ने टोक दिया था, “ क्या कहते हैं मरड़, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि...” मरड़, अर्थ तो समझ नहीं पाए लेकिन गुरु जी को थाहने में आधा कामयाब हो गए।
अगर प्रस्तावित पंचायत – भवन उठकर दूसरे गांव में चला गया तो पूरा गांव गुरु जी और मरड़ को कोसेगा। मरड़ के पास सड़क किनारे जो जमीन है वह गांव से दूर है तो गुरु जी का ही आसरा बचता है।
फिर एक दिन मरड़ ने गांव की सभा बुलाई। सबने खासकर, मरड़ की ही यादव टोली के लोगों ने कहा, “ यह गांव तो आपके चरणों में है गुरु जी, सब तो आपका ही बाल बच्चा है, भगवान् ने जमीन दिया है आपको तो ज्ञान भी दिया है, सो दस आदमी का मन रखना ही चाहिए, नहीं तो एक घर वाला जात का परिवार अबतक कौन – से गांव में टिका है ?” गांव -समाज के इस दबाव और भय के सामने महेन्दर गुरु जी आखिर पिघल ही गए। मरड़ ने जोर से कहा , “ बोल दे बाबा बिसुरात की जय !” पीछे – पीछे सबने जयजयकार किया और गुरु जी को फिर से फूल – माला पहनाई।
अबतक गुरु जी इतने बड़े त्यागी पुरुष हो चुके थे कि पुस्तकालय और मंदिर के लिए स्वेच्छा से जमीन दे दी। गोठ बस्ती में सिर्फ डीहवाली जमीन बची थी जो दस कट्ठे की थी।
...सुनकर रग्घू के मगज की नस गर्म हो रही थी। सचमुच जालो को छोड़कर गांव में सब कंस हैं।
वह अपना नया पांच बिग्घी खेत लीज पर जालो को नहीं देगा तो और किसको देगा ? और है कौन भरोसे के लायक ?
रग्घू ने जालो को बीच में रोका, “ भाय, कोसी वाली जमीन आप ही करो, लीज पर अच्छा रहेगा, जरूर आप मेरे पूर्व जन्म का कोई भाई हो...वर्ना इतना कौन करता है ?” सुनकर जालो मन ही मन हंसने लगा, “ रग्घू को अभी भी दुनियादारी नहीं मालूम, गांव में भाई ही भाई को ....”।
निर्लोभ और निःस्वार्थ स्वर में उसने समझाया, “ नहीं रग्घू, जमीन तू ही खुद कर, खेती की आदत अभी से डाल, अगले साल शादी भी कर” । रग्घू की कथापरक जिज्ञासा एकाएक युवा – सुलभ सपनों में उलझ गयी ।
इतना कौन किस के लिए सोचता है ! जमीन वापस दिला दी जालो भाय ने, अब जोरू भी... रग्घू ऐसे आदमी की बात कैसे काटेगा ? सो उसने खुलकर कहा ही दिया, “ लेकिन लड़की कहां से आएगी भाय ?” “ सब हो जाएगा रग्घू, लायक लड़के के लिए लड़की को कौन पूछता है , बस थोड़ी मेहनत और थोड़ा खरचा- वरचा लगेगा”। जालो को थाह लग गयी थी कि रग्घू इसके लिए कोई कीमत चुकाने के लिए तैयार बैठा है।
जालो कल ही धमदाहा फोन लगाएगा। वहां रग्घू की जाति के कई छोटे – बड़े परिवार हैं। लेकिन रग्घू को मालूम था कि उसकी बिरादरी में बिना नौकरी के लड़कों की शादी नहीं होती। पिछले बार तो दादा के नाम पर एक लड़कीवाले ने हां कह दी थी। धमदाहा वाले तो ऐसे हां बोल ही नहीं सकते। रग्घू के मन में तरह - तरह की आशंकाएं उठने लगीं।
लेकिन जालो की एक बात में दम है, आजकल जमीनवाला लड़का, कायथ में मिलता कहां है ? पढ़ा – लिखा तो है ही थोड़ा बहुत, धमदाहा में रजिस्ट्री आफिस के सामने चट्टी गिराकर मुंशीगिरी सीख ही लेगा, खाली कोई मुंशी जी तैयार हो जाए । जालो ने शोभालाल मुंशी का नाम भी ले लिया था, यह कहते हुए कि उनकी आठ बेटियां थीं और तीन की शादियों में ही उनकी नसें ढीली हो गयी थीं । सुनते ही रग्घू की उम्मीद को जैसे पंख मिल गई और उस पंख को जालो की हवा का सहारा ... खरचा - पानी जो हो देखा जाएगा।
उस रात जालो को जब समझ में आ गया कि रग्घू अब उसकी बात से बाहर नहीं है तो उसने एक साथ कई नकली जम्हाइयां लीं, नींद का स्वांग रचा, लेकिन रग्घू को उसने यह कहां बताया कि उसके दादा जी अवतारी पुरुष या देवता क्यों नहीं बन पाए ? वहां भी सचमुच कोई चूक हुई थी या फिर कोई ऐसी ही चीटिंगबाजी ?
रग्घू की जिद पर जालो को तत्काल कहना ही पड़ा था ...
तुम्हारे दादा बचपन में, बस्ती के ग्वाल – बाल के साथ गाय चराने जंगल की ओर जाते थे। गाय चराना क्या होता था, सभी चरवाहे गायों को जंगल में छोड़ देते और शाम तक पूरब की कोसी – धार में वे नहाते– खेलते। भर पेट चरी हुई गायें प्यास के मारे झुंड के झुंड कोसी -धार में ही आकर मुंह रोपते । सो चरवाहों को मवेशी ढूंढने की भी जरूरत नहीं होती थी ।
...लेकिन उस दिन गुरु जी की एक गाय वहां पानी पीने नहीं आई । उसे शंका हुई, कहीं कोई जंगली जानवर उसे... बाल – गोपाल रोने लगा और रोते -रोते जंगल में घुस गया । अपने बाप की डांट खाने के बजाय गाय को खोजते – खोजते जंगल में जान देना ही उसके लिए ठीक लग रहा था। वह गाय उसके नाना ने, तीन महीने पहले ही भिजवाई थी ताकि इकलौता नाती को दूध – दही का दिक्कत नहीं हो। उसके हाल में ही बछड़ा भी हुआ था।
गुरु जी को ताज्जुब हो रहा था कि उसके गले की घंटी क्यों नहीं बज रही ? तभी सामने अंधेरी होती गुफा से आवाज आई, “ गाय जंगल में रहे तो घंटी बजे न बच्चा ? गुरु जी का बदन पानी हो गया । डर से हालत पतली, सुनकर एकाएक अवाक् !
गुफा से एक विचित्र मानव – आकृति सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी बड़ी – बड़ी जटाएं – दाढ़ी, अर्द्ध - नग्न शरीर, माथे पर भभूत, हाथ में त्रिशूल, कमर में कुछ लपेटे ...अब उतने साफ – साफ नहीं दिख रहे थे । गुरु जी ने सही समझा, यह कोई अघोरी बाबा था कोई भूत-प्रेत या राक्षस नहीं। उसे थोड़ी तसल्ली हुई लेकिन रोने लगा, “ बाबा, गाय भाग ...बाबू जी तो मुझे मार...। बाबा को दया आई, आंखें बंद कर आसमान की ओर देखा और आंख खोलते ही कहा, “ गैया पहुंची मैया के पास बच्चा, तू रोता क्यों है ? वह आएगी लेकिन बोल तू मुझे दुद्धा पिलाएगा”? बाबा की बातों से बच्चा थोड़ा आशान्वित हुआ, असुरक्षा एवं भय जरा टूटा और उसने जवाब दिया,“ हां, बाबा, आपके लिए रोज दुद्धा लाऊंगा, बस गाय वापस आ जाए , बांकी आपका जो हुकूम!”
गाय रातोंरात पोठिया पहुंच गई थी। पोठिया अर्थात् गुरु जी का ननिहाल। गुरुजी जंगल से ही ननिहाल की ओर पैदल निकल पड़े थे। तीसरे दिन वह गाय लेकर गांव वापस आए थे । लेकिन जंगल के अघोरी बाबा और दुद्धा की बातें किसी को नहीं बताईं। बाबा की तस्वीर और उन्हें दुद्धा पिलाने की बात नजर या दिमाग से हटती ही नहीं थी।
अब रोज सुबह डेढ - दो किलो दूध लेकर जंगल की ओर निकल पड़ते, अघोरी बाबा दूध पीकर प्रसन्न हो जाते और अपनी घनी दाढ़ी – मूंछ में लगे दूध को हाथ से पोंछते हुए पूछते, “ बोल बच्चा क्या खाएगा ?” एक दिन गुरु जी ने कहा, “ रसगुल्ला”। बस क्या था बाबा ने आंखें आसमान की ओर उठाईं, और कुछ बुदबुदाते हुए दाहिना हाथ हवा में उछाला, हथेली वापस नीचे खींची तो गुरु जी फटी आंखों देखते रह गए - बड़े – बड़े, रस-भरे, ताजा रसगुल्ले, बिलकुल नवगछिया बाजार वाला..., गुरु जी ने सभी रसगुल्ले रस गाड़कर खाए थे।
गुरुजी की सरलता और सेवा – भावना देख बाबा ने उसे शिष्य बनाने की सोच ली थी। सो एक दिन जब गुरु जी, बाबा को दूध पिलाकर लौट रहे थे, बाबा ने वापस बुलाया, गोद में बिठाकर प्यार से बताया, “ बच्चा, मेरा चेला बनेगा ?” गुरु जी को ना बोलने की शायद हिम्मत नहीं हुई होगी, तो उन्होंने हां में सिर्फ सिर हिला दिया था। उसी दिन अघोरी बाबा ने पहला मंत्र दिया था।
मंत्र – जाप में अच्छी गति देखकर बाबा ने बाद में हरेक महीने नया मंत्र देना शुरू कर दिया। गुरुजी को भी कुछ शक्ति और चमत्कार का आभास होने लगा था। लेकिन बाबा का सख्त निर्देश था, ऐसा कुछ होने पर साधक को और स्थिर तथा आत्मनियंत्रित रहना चाहिए, नहीं तो शक्ति दुधारी तलवार होती है।
सो गुरु जी अपने गुरू की बातों पर साल – भर चलते रहे। बाबा ने बताया था, “ बच्चा, आनेवाले दुर्गा - पूजा की अष्टमी को तेरी मंत्र – सिद्धि सफल हुई तो तू मेरी तरह ही सभी सिद्धियों और निधियों का मालिक बन जाएगा, फिर तो दुनिया तेरे कदमों में होगी”। बोलते ही बोलते उसके हाथ में एक लाल रंग का बोतल आ गया। बाबा बोले, “ देख यह भागलपुर के कलाली की दारू है, एक घूंट चढ़ाएगा, बच्चा?” बच्चा ने देखा – उस पर अंग्रेजी में कुछ लिखा था पर वह कुछ बोल नहीं पाया।
अपने बाबा की महिमा देखते – देखते बच्चा अब चमत्कृत कम होता था और स्वयं को लेकर उत्साहित ज्यादा।
…और वह दिन यानि रात आ ही गयी। पहली पूजा के दिन ही बच्चा ने अपने बाबा के आदेशानुसार, जंगल में अपनी धुनि लगा दी। गांव में हल्ला हो गया कि गुरूजी कहीं तो भाग गए।
अष्टमी की रात थी, बाबा ने शिष्य अर्थात् बच्चा को आंखें खोलने को कहा। शिष्य ने देखा – वे दोनों कोसी के एक अनजान जंगली किनारे पर खड़े हैं। नदी में अनेक लाशें तैर रही हैं, किनारे पर कुछ भुक् – भुक् – सा जल उठता है , शायद इन्हें ही सब राकस बोलते हैं । एकाएक खड़खड़ाते पत्ते, लेकिन कोई डर नहीं। शक्ति – सिद्धि की रात में डर कैसा ? यहां तो थोड़ी देर में, सिद्धि प्राप्ति पर महानाच होगा, तांडव ...और सारी शक्तियां नीचे लोटेंगी ।
बाबा ने एक लाश को आवाज दी, बस क्या था, बहती चिता से एक मुर्दा उठकर पानी पर दौड़ता हुआ बाबा के चरणों पर लोटने लगा। एक - एक कर सैकड़ों मुर्दे उठ खड़े हुए। शिष्य को अपनी शक्ति का क्रीड़ा- कौतुक दिखाने के लिए बाबा ने उन्हें आपस में खूब कुश्ती करवायी। शिष्य अचंभित था और सिद्धि के चमत्कारिक क्षण उससे कुछ ही दूर थे।
तभी बाबा ने एक मुस्टंड जवान मुर्दे को शिष्य से भिड़ने के आदेश दिए। शिष्य लंगोट लगाए तैयार ही था। काली गैया का दूध और बाबा की विद्या की आज असली परीक्षा थी और शक्ति – सिद्धि का अनमोल अवसर।
गुरुजी और मुर्दे में भयानक भिडंत हुई। बाबा लगातार हिदायत देते रहे, मंत्र मत छोड़ना बच्चा, ऊं ह्रीं क्लीं भ्रूं भ्रीं...त्रोटय त्रोटय...कुरु स्वाहा...छोड़ना मत, तू जीतेगा ।
देखते ही देखते एक साथ सैकड़ों मुर्दे शिष्य से भिड़ गए। शिष्य ने पूरे मनोयोग से निर्देशित मंत्र का जप करते हुए एक -एक कर सबको धराशायी कर दिया । तभी उनमें से एक मुर्दा फिर उठा और शिष्य से फिर भिड़ गया, उसे शिष्य ने उठाकर पटका और बाबा के निर्देश पर उसकी छाती पर बैठ गया। बाबा ने कहा, “देखता क्या है बच्चा ! हपक उसकी छाती में, पी ले उसका खून, और तू बन जा शक्ति का मालिक”।
बाबा गुस्सा हो रहे थे, शिष्य मुर्दे की छाती में दांत गड़ा क्यों नहीं रहा है? “ बच्चा , गड़ा… ऊं खां खीं खूं …जय भैरवी...अगर तुरत हपका नहीं तो तेरा खेल खतम बच्चा, तू मुफ्त में मारा भी जाएगा, मादरच..”।
उसकी छाती पर दांत गड़ाते – गड़ाते शिष्य अपना मुंह मोड़ लेता था। तभी बाबा ने जोर से उसकी पीठ में लात मारी, लेकिन वह पत्थर हो गया था । खूब हिम्मत लगाकर शिष्य बोल उठा, “ बाबा, मैं वैष्णव हूं, दुद्धा दास और मां का वचन है। यह सुनते ही अघोरी बाबा गुस्से में तमतमाते हुए बोल उठा, “ भाग, सूअर की औलाद, हरामखोर, जा अपनी मां के...” ।
…और इस तरह शिष्य भाग खड़ा हुआ। जान बच गयी, यही बहुत थी।
बाबा की तंत्र - विद्या इतनी शक्तिशाली थी कि उसका प्रभाव बहुत बाद तक बना रहा। बच्चों को पढाते हुए गुरु जी उनके रोने पर उन्हें मुट्ठी में मिट्टी लेने बोलते और मुट्ठी खोलने पर हाथ में मिसरी का ढेला होता, बिल्कुल बौकू साह की दुकानवाली मिसरी ।
तंत्र – साधना की इस खतरनाक और डरावनी कहानी के दुखद अंत ने रग्घू को भीतर से हिला दिया था। सोच रहा था – उसके दादा सचमुच मूर्ख थे, आज के जुग में वचन और धरम को कौन पूछता है? सूंगठी खाकर जो नास जाए वो भी कोई धरम है ! एक बार हपक कर खून पी लेते तो दादा आज देवता बन जाते, और अवतारी पुरुष कहलाते...हमारी भी पूजा होती...सोचते – सोचते रग्घू को नींद आ गई। जालो उठकर अपनी बीवी के पास चला गया।
थोड़ी ही देर बाद रग्घू को लगा, कोई उसके सिरहाने में बैठ खूब प्यार से उसका माथा सहला रहा था, और उसके कान में फुसफुसा रहा था, “ बेटा, डर मत, मैं तेरा दादा हूँ”। रग्घू ने आँखें खोलकर देखने की कोशिश की लेकिन लगा कोई ताकत उसकी पलकें अंदर की ओर खींच रही थी। वह डर गया। लेकिन फुसफुसाहट फिर शुरू हुई, “बेटा, जालो झूठ बोलकर तुम्हें अपना बना रहा है। गांववाले ने मेरे साथ कोई धोखा – धड़ी नहीं की। भू – दान स्वेच्छा से किया मैंने, पूरे होशो- हवाश में, बिना किसी भय या दबाव के, जालो तुम पर जाल फेंक रहा है, उसकी नज़र कोसी वाली जमीन पर है। उसने सिर्फ छाती में हपकन वाली बात सही बताई है, शक्ति और पूजा के लिए धरम नहीं गंवा सकता था मैं, और सुन गांव में सारी सम्पत्ति या जमीन मैंने अपने बाहुबल और बुद्धि से अर्जित की थी, तुम्हारा नालायक बाप उसे नशे में उड़ा देता इसलिए मैंने अपनी कमाई को एक जगह पकड़ाई। अब तेरी सोच है , तेरा समय है...और जान ले, समय तो पानी होता है, इसका अपना कोई रंग नहीं, रंग तो हम डालते हैं बेटा”। माथे से बूढ़ी हथेलियों का अनुभवी स्पर्श एकाएक गायब हो गया।
रग्घू की आंखें खुल चुकी थीं, लेकिन मगज फिर गरम हो रहा था, आउट आफ कंट्रोल !
वह मचान से उतरकर कोसी वाली जमीन की ओर तेजी से भागा जा रहा था, उसने नदी में उतरकर स्नान किया, लेकिन मगज ठंडा नहीं हो रहा था। ऊपर से जेठ का वह दिन चढ़ता ही जा रहा था ।
रग्घू अब गांव पहुंच गया था, कान पर एक पुराना मोबाइल लगाए वह कुछ से कुछ बकबका रहा था...हेल्लो हेल्लो हेल्लो रे..मुर्गी - झोर भेल्लो रे... चढ़ती दोपहर को रग्घू खाली पैर, तपती धूल -धूसरित सड़क के बीचोंबीच बेतहाशा दौड़ता और पीछे-पीछे दस -बीस बच्चों का झुंड , “ हेल्लो हेल्लो रे ...” दोहराता हुआ भागता । बच्चों के लिए यह मौसमी कौतुक- भर होता था लेकिन बड़े- बुजुर्गों के लिए एक पीड़ादायी और अफसोसनाक दृश्य, और गुरु जी के कुछ शिष्य कहते, “ बूड़ा वंश कबीर का ...” ।
बच्चे जब दौड़ते थक जाते, रग्घू कुछ दूर तक अकेले ही दौड़ता और गरज - गरजकर आंखें लाल -लाल कर लेता, “ ...करोड़ ... हपक - हपक, बच्चा, हपक ”। फिर हांफते हांफते बोल उठता, “ छोड़ जलवा...तेरी मचान पर कुत्ता भूंके..., चल धमदाहा , सोभाबाबू मुंशी..., हपक, हपक …चार करोड़…! फिर लुढ़क जाता !
लोग उसकी इस हरकत को भूत – प्रेत का प्रकोप समझकर टाल देते तो कुछ यह बोलकर कि , “ अपना अपना भोग...”। □□□
----16/09,018
Saturday, 15 September 2018
समय के रंग / कहानी
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