Wednesday, 5 September 2018

सड़क / कहानी / दिलीप कुमार दर्श


तीसरे गर्भपात के बाद स्त्री कितनी धर्मशाला हो जाती है मालूम नहीं, मगर हर तीसरी बारिश के बाद यहाँ की सड़क, गड्ढा या नाला हो जाती है, यह सबको मालूम है। रुपौली और नवटोलिया के बीच की सड़क एक बार फिर टूटकर गड्ढे और नाले में तब्दील हो गई है।

पुनर्निर्माण तो दूर, इस बार गड्ढे भरने के भी आसार नज़र नहीं आ रहे। साल भर पहले ही चुनाव हुए हैं । चुनाव के ठीक  पहले पुनर्निर्माण कार्य अभी शुरू ही हुआ था कि एक दिन कुछ बदमाशों ने बीच सड़क पर सिविल इंजीनियर को गोली मार दी । ठेकेदार, जो तत्काल बोरिया-बिस्तर समेटकर गए, आज तक वापस नहीं आए। आती रहीं सिर्फ खबरें ... अपहरण, फिरौती, हत्या, जातीय गैंगवार या मजहबी उन्माद की । पुलिस , कानून , प्रशासन ...सब मूकदर्शक !

परन्तु सड़क के टूट जाने से जीवन की गाड़ी रुकती नहीं, रुकती तब है जब गाड़ी का एक्सल ही टूट जाता है, अन्यथा यहां गड्ढे या नाले की पंकिल छाती को चीरकर गाड़ी निकालना किसी संघर्ष से कम नहीं और उनसे बचाकर निकालना, न ही किसी कला से कमतर । इस इलाके में गल्ले के कारोबार में सफल होने के लिए जो भी गुणात्मक शर्तें जरूरी हो सकती हैं, उनके अलावा इस संघर्ष और कला में भी साहसी और प्रवीण होना पड़ता है, ठीक मकुंदी भगत की तरह ! फिर उसके पास तो गाड़ी के नाम पर ट्रैक्टर है, इसका एक्सल इतनी आसानी से नहीं टूटता ।

यह सड़क पूरे इलाके के लिए जीवन - रेखा है, और मकुंदी भगत के लिए तरक्की का महामार्ग। जब वह अठारह साल का था वह इसी सड़क पर अपना टमटम चलाता था। पांच -छह साल के बाद जब बहुत सारी गाड़ियां चलने लगीं और जब टमटम को कोई पूछता न था तो उसने घोड़ा - सहित टमटम बेचकर इसी लाइन की एक बस में कंडक्टर की नौकरी कर ली।

एक दिन जब लौटती बस में डोभा के छंगुरी साह अपने परिवार सहित लालगंज जा रहे थे, मकुंदी की नज़र उसकी जवान बेटी पर पड़ी थी। उसके हंसमुख चेहरे में प्रतिबिंबित मंशा की एक झलक देखकर लड़की की नजर जिस तरह झुक गईं थी, उसे वह कभी भूल नहीं  सका। मकुंदी ने साह जी से बस भाड़ा लेने से बिल्कुल मना कर दिया था। उसकी सदाशयता पर लट्टू होकर सद्यःकृतज्ञ साहजी ने जब कंडक्टर का नाम पूछा था तो मकुंदी  स्वयंवर- सह – साक्षात्कार की मुद्रा में जबाव दिया था, “ मुकुंद भगत”।

अब तो वह साह जी का दामाद है , वो भी इकलौता । उसकी पत्नी ने शादी के महीने-भर बाद ही उसकी बसवाली नौकरी छुड़वा दी थी।

आज अगर मकुन्दी भगत गाँव में छोटा – मोटा लेकिन तेजी से उभरता हुआ एक सफल गल्ला - व्यापारी है तो अपनी बीवी और उस सड़क की बदौलत। यही सड़क उस गांव को कुरसेला और गुलाबबाग की बड़ी गल्ला – मंडियों से जोड़ती थी।

उस दिन तुरत फोन आया कुरसेला मंडी से । मक्के का भाव आसमान पर है। दक्षिण अफ्रीका के कुछ इम्पोर्टर का आर्डर पूरा करने के लिए मुंबई के कुछ एक्सपोर्टर बहुत दबाव में आकर मकई का अच्छा - खासा दाम दे रहे हैं। इसलिए स्थानीय मंडीवाले इस अवसर को हाथ से जाने देना नहीं चाहते । उनके स्टाफ ने मकई पैदावार के लिए मशहूर इस इलाके के लगभग सभी छोटे – बड़े गल्ला कारोबारियों को देर रात फोन कर दिया था। कल आठ बजे सुबह तक जितना माल आएगा सबको पन्द्रह के भाव में ले लिया जाएगा और पैसा भी नगद और तुरंत। पूरे क्षेत्र में खलबली मच गई ।

उत्साहित मकुन्दी ने सोती बीवी को उठाया । जुलमी को तुरंत फोन किया और बोला, “ टोले से आठ -दस आदमी को लेकर जल्दी आओ। अभी जाना है”। जुलमी ने मोबाइल में समय देखा और थोड़ा सकपका गया , “ बाप रे ! एक !  इतनी रात को कौन आएगा बोरी के लोडिंग के लिए। फिर भी चार बजे सुबह तक ट्रेलर पर बोरियां लद गईं। मकुन्दी ने जाते – जाते मजदूरों से कहा, “शाम तक लौट आऊंगा, तब आना पैसे लेने”।

जुलमी गांव का कोई लेबर कांट्रैक्टर नहीं, दरअसल ट्रैक्टर ड्राइवर था। जब से खेतजोता ट्रैक्टर की नौकरी छोड़ी और रोड पर पर ट्रैक्टर डलायभरी का काम हाथ में लिया, लोडिंग -अनलोडिंग के लिए गांव में आठ – दस मजदूरों से हेम – छेम स्वाभाविक रूप से  हो  ही  गया  था। ये मजदूर समय – समय पर  दिल्ली -पंजाब भी भागते रहते थे काम की तलाश में। कुछ ने जुलमी को भी बहुत बार कहा था, “भगता की खवासी कबतक करते रहोगे भैया, चलो थोड़ा देस – दुनिया भी तो देखो, पेट – भात तो हाथ में अगर इलम है, कहीं भी चल जाएगा “।

लेकिन जुलमी, मकुन्दी को छोड़ नहीं सकता । उनकी दोस्ती – यारी खानदानी है , दादा के जमाने से ही। लोग कहते हैं मकुन्दी के दादा इतना अच्छा लड़वारी खेलते थे और इतना रेघा- रेघाकर मुहर्रम के गीत गाते थे कि लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते। धरम – इमान के लिए इतनी बड़ी शहादत का यशोगान आजतक गांव में कभी किसी ने नहीं गाया।  मियांटोली से ताजिया मकुन्दी के दादा के आने के बाद ही उठता। दोनों के दादा तो चले गए लेकिन दोस्ती अनवरत चलती रही ।

अब तो जुलमी सोचकर भी बाहर नहीं जा सकता। घर में नयी दुल्हन छोड़कर...फिर मकुन्दी जैसा अपना आदमी और कौन होगा ?  बिल्कुल बड़े भाईजान जैसा ।

जुलमी ने पीर बाबा को सुमिरा और ट्रैक्टर की चाबी घुमाई। हेडलाईट की तेज- लंबी रोशनी में दूर तक तहस – नहस सड़क जगमगा उठी । आगे तो और भी ...। जुलमी का आत्मविश्वास इस तरह कभी डगमगाया नहीं था ।

“आराम से जुलमी, कोई जल्दी नहीं है। आठ बजे तक पहुंचना है कुरसेला” - बाईं सीट पर बैठा मकुन्दी बोल पड़ा। जुलमी ने उसकी बात अनसुनी -सी करते हुए थोड़ा चिढ़ते हुए कहा, “ आठ बजे के बाद क्या सब मकय सोड्डा थोड़े ही हो जाएगा ? मकुन्दी समझ गया। जुलमी की हाल में ही शादी हुई है। खासकर नई दुल्हन को भी बस या गाड़ी पर काम करनेवाले दुल्हे से शुरू -शुरू में बड़ी चिढ़ होती है। रात को भी कभी - कभी उठकर जाना पड़ता है, मकुन्दी को बखूबी पता है।

लेकिन जुलमी मियां को क्या मालूम बाजार की उछाल ? उसे तो बस ट्रैक्टर के अगले और ट्रेलर के पिछले चक्के की उछाल ही पता है । खेती और बिजनेस दोनों में समय का थोड़ा भी आगे – पीछे नहीं चलता। दिन का चैन और रातों की नींद गंवानी पड़ती है तो रूपचंद महाराज के दर्शन होते हैं। मकुन्दी, जुलमी को अक्सर यह समझाते रहता था लेकिन वह उसकी बातों को इस कान से सुनकर उस कान से निकाल देता था।

उसका ध्यान अभी सड़क पर ट्रैक्टर की गति और संतुलन पर टिका था , “ भैया , लेकिन डलायभरी में तो एक पल का भी आगे  - पीछे नहीं चलता वरना सब ओम नमो सुआहा”।
मकुन्दी ने पिछले कुछ महीनों से गौर किया था, “ओम ‘ बोलते ही आजकल जुलमी असहज होकर अपनी जीभ दांत से काट लेता है, जैसे तोबा – तोबा ...।
मकुन्दी ने थोड़ी उदासी से हामी मिलाते कहा , “ मान गए  उस्ताद । संभालके, आगे सड़क  और  भी खराब है “।
“और आगे अब खराब ही रहेगी , भैया,” जुलमी ने जम्हाई लेते हुए कहा । । मकुन्दी ने सड़क के खराब होने की जो दूरी – सापेक्ष सूचना दी , जुलमी ने उसे समय -सापेक्ष बनाकर ,भविष्य की अनिश्चितता बढ़ा दी।
“ सुभ – सुभ बोलो जुलमी ” शुभसोची मकुन्दी ने थोड़ा आश्वस्त लहजे में उम्मीद जताई ।

लेकिन जुलमी सुभ – सुभ कैसे बोल सकता है ! कल ही गोठ बस्ती में जागेसर नेता खुलेआम  बोल रहा था ,  “ हमारी जनता पांव – पैदल है।  गाड़ी – घोड़ावाले किलास ने हमें भोंट देकर पटना नहीं भेजा है। हमारे वर्ग की पहली जरूरत है सम्मान और न्याय, सड़क तो सब सरकारें बनाती है ...” । मकुन्दी चिढ़कर बोल उठा, “ साला , भैंसवार से नेता तो बन गया, अक्कल को भैंस की पीठ पर ही छोड़ आया, लगता है। सड़क की भी कोई जात या किलास  होती है” !

लेकिन आज मकुन्दी के दादा होते तो जरूर कहते,  “ हां होती है जात या किलास सड़क की भी । कोई पचास साल पुरानी बात आज भी लोग सुनाते हैं कि किस तरह मकुन्दी के दादा को अपने माथे पर चप्पल रखकर सौ बार कनपकड़ा उठ – बैठ करना पड़ा था । अपराध सिर्फ इतना था कि जब ड्योढी के जमींदार मथुरा बाबू अपने लाव – लश्कर के साथ मोहनपुर बाजार की ओर उसी रस्ते से कूच कर रहे थे, उनके सामने वह चप्पल पहनकर बीच सड़क पर निकल  आए थे। लेकिन दादा का बदला पोता से लेकर कोई न्याय या सम्मान हासिल करने की बात करे, यह मकुन्दी को कभी हजम नहीं होती ।

ट्रैक्टर ने थोड़ी  स्पीड पकड़ी तो ब्रह्ममुहूर्तवाली हवा की ताजगी थोड़ी राहत पहुंचाने लगी । अचानक  जुलमी का मोबाइल भों – भों कर शर्ट की जेब में थरथराने लगा। “
भ्रामरी और कपाल – भाति योग एक साथ मोबाइल में ही संभव है , इंसान में नहीं।

“ देखो जुलमी , दुलहिन का फोन होगा, बोल दो, नकमुन्नी और सिल्कवाली साड़ी लेकर आ रहा हूं”। मकुन्दी की बातों पर जुलमी थोड़ा सकपकाया।

नकमुन्नी और सिल्कवाली साड़ी पहले कभी खरीदी ही नहीं और दाम जाने बिना बीवी से ...कहीं झूठ हो जाऊं, वो भी पहली बार । लेकिन जुलमी ने देखा था जब मकुन्दी भैया की शादी हुई थी और नया – नया कारोबार था, कुरसेला या पूर्णिया से लौटते वक्त  भाभी  के लिए  कुछ – न – कुछ खरीद ही लेता था और भाभी कितनी खुश होकर रख लेती और अपने पति के कमाऊ होने का कितना गुमान भी करती थी। जुलमी ने पूछा,  “ भैया, लेकिन इसमें लगेगा कितना ?” मकुन्दी ने हंसकर पीठ सहलाते कहा था , “ बुड़बक , कितना छह – सात हजार लगेगा ?  दुलहिन तो खुश हो जाएगी ।“ मन ही मन अपने तनख्वाह का हिसाब लगाते हुए जुलमी के मुंह से निकल पड़ा, “ बाप रे तो महीने का खर्चा कैसे चलेगा ? और मुरगा- मछली या अंडा तो उसे हफ्ता में दो बार चाहिए ही ।“

मकुन्दी को मुरगा – मछली के नाम से घिन आती है । वह दुद्धा दास है। संतमत का समर्पित सत्संगी।  वह जुलमी के मजहब की सारी बातों का कायल है बस खाली ये मुर्ग – मसल्लम् ...।

वह जुलमी की मजबूरी समझ रहा था। उसकी मासिक  तनख्वाह ही थी सात हजार मात्र।

मकुन्दी को अपने दिन याद आ गए। एक समय था उसे पूरी देह बस्तर नसीब नहीं था, साग - सत्तू खाते दिन जाते थे,  मां- बाप पान - बीड़ी-खैनी की छोटी -सी दुकान  लगाते थे। घर भी क्या था , दोठठिया छप्पर का ढालनुमा वितान । आज न वे दिन हैं न ही वह घर...न ही वे मां -बाप जो कितनी बार कहते थे , " इस बिजनिस में बहुत रिक्स है । ऊपर से अगर आमदनी लाइट में आ जाए तो जान पर आफत अलग से , कभी भी फोन आ जाए कि इतना भेज देना, नहीं तो तेरी...।  मकुन्दी के मन में ये बातें बीच - बीच में घंटी बजाती रहती हैं..."अगर आमदनी ला...।"

साल -भर से वह गल्ला – ढुलाई के लिए एक और ट्रैक्टर  निकालना चाहता था, लेकिन, उसकी अच्छी -खासी कमाई कुछ लोगों की नजर में न चढ़ जाए, इस डर से इस जरूरत को टालता रहा था। यही नहीं, दोमंजिला मकान बनाने का विचार भी फिलहाल त्याग दिया। बड़ी चरपहिया खरीदने की इच्छा मन में ही रखी। पत्नी के लिए गहने गढवाने या महंगी साड़ियां खरीदने की मंशा भी स्थगित करता रहा । तरक्की और समृद्धि की पदचाप घर- आंगन से बाहर न पहुंचे , बहुत सोच – समझकर उसने व्यय और  प्रदर्शन के सारे द्वार उसने यथासंभव बंद रखना ही उचित समझा था । सिर्फ अपने दोनों बेटों के पढ़ाई -खर्चे में कटौती नहीं की क्योंकि गाँव के असुरक्षित और बिगाड़ू माहौल से अपने बच्चों को दूर रखने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं  था ।

मकुन्दी  को इस मुकाम पर पहुंचाने में जुलमी ने कम  मदद नहीं की है । रात- बेरात,  धूप – बारिश, ऊंचा -नीचा उसने कभी  कुछ देखा नहीं  मकुन्दी के लिए , वह उसकी पीठ पर कभी भाई, कभी कुली तो कभी नौकर की तरह  हमेशा खड़ा रहा है।  ईमान -धरम और जुबान का पक्का है जुलमी । मकुन्दी ने भी बहुत संभाला है उसको ।

...लेकिन आज मकुन्दी की जुबान से अपने -आप निकली थी, “ बोल दो जुलमी, नकमुन्नी और सिल्क.....”।

इसलिए आज वह कुरसेला में अपनी पत्नी के लिए कुछ नहीं खरीदेगा। उसे विश्वास है, यह जानने पर कि उसने जुलमी की बीवी के लिए नकमुन्नी और साड़ी खरीदकर जुलमी को दिया है तो वह खुश ही होगी, नाराज तो बिलकुल नहीं।  आखिर कुलीन- खानदानी परिवार में शादी का यही फायदा तो है। सौभाग्य से ही उस परिवार में उसकी शादी हुई , नहीं तो बस कंडक्टर को कौन पूछता था  ? ये सब सोचते – सोचते मकुन्दी ने जुलमी से कहा था, “ पैसे की चिंता मत कर उस्ताद, बस सात बजे वहाँ पहुँचने तो दे, तब देखना तुम अपने सेठ का दिल । जुलमी ने कई बार देखा है मकुन्दी भैया का दिल, उनके अनाज के गुदाम से कई गुना बड़ा है ।

उसके सामने हेडलाईट की रोशनी एकाएक जैसे और तेज हो गई ...दूर से कोई नयी दुलहिन ट्रैक्टर की ओर बीच सड़क से तेजी से आ रही है ... जुलमी जैसे एक क्षण के लिए ठिठक गया..नकमुन्नी और सिल्कवाली साड़ी चमक रही थी। जुलमी चौंका , झपकी टूटी । हल्का ब्रेक लिया , स्पीड और कम की। मकुन्दी  डर गया । ओवरलोड गाड़ी है। तुरत हौसलाअफजाई और भय के बीच संतुलन बिठाकर बोल उठा, “ देख जुलमी,  अभी भोर का समय है, नींद इसी वक्त सबसे ज्यादा सताती है, तीनटेंगा टोला के गुरूदेव भगत का बेटा पूर्णिया से , यही आखाढ - सावन का महीना था , तड़के सुबह गांव लौट रहा था और गेड़ाबाड़ी चौक से पहले ही ...आगे मकुन्दी बोल नहीं पाया।

जुलमी ने आँखें फाड़कर रोड पर नजर दौड़ाई। हां,उसके भी  घर में अब कोई है जो राह देख रही होगी।  वह भी अब अकेला नहीं है।

रफ्तार थोड़ी कम हुई और अब कम ही रहेगी रूपौली तक !

...लेकिन रफ्तार कम करने और गीयर बदलने में थोड़ी देर हो गयी । ट्रैक्टर के अगले पहिये तो निकल गए थे मगर पिछले बड़े चक्के और ट्रेलर गडढे की कीचड़ में बुरी तरह फंस गए । जुलमी जोर लगाता रहा लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ रहा था ।

मकुन्दी ने अपना मोबाइल देखा ।  पाँच बज चुके थे और अभी रुपौली भी नहीं आया। बह घबराया और मोबाइल से काल करना शुरू किया।  शायद वह मंडी के सेठ को फोन लगा रहा था या बगल के गांव में अपने ससुरालवाले को । इतना सबेरे कौन फोन उठाएगा ?

दोनों ने कमर कसी।  टेलर से फावड़ा उतारा और लकड़ी के दो – चार  तख्ते  । जुलमी ने टायर के आगे – पीछे से कीचड़ हटाना शुरू किया । मकुन्दी ने टायर के आगे तख्ता लगाया । जुलमी ने फिर कोशिश की, लेकिन चक्के थोड़ा आगे बढ़कर फिर उसी जगह जम गए । ऐसा पहले भी होता था लेकिन गाड़ी निकलती थी । “आज कौन – सा ग्रह है ! हे  गुरु महाराज  !,” बेबस मकुन्दी के मुंह से निकल पड़ा ।

दोनों ने दो – तीन बार फिर वही रणनीति आजमायी । थक – पक कर जुलमी ने जबाव दे दिया,  “ भैया, छह तो यहीं ‘ अब हिले न डोले ‘ में बज गए । कोई किरान या ट्रैक्टर बुलाना ही होगा । “

मकुन्दी का मोबाईल बज उठा । उसके साला का फोन था, “ जीजा जी , सब ठीक  तो है ? सुबह - सुबह फोन देखा”। मकुन्दी की जान में थोड़ी जान आई। बोला, “ अरे क्या बताएं यहां कठपुला के आगे हमलोग फंसे हैं , मतलब मक्के से लोड टेलर पूरा गड्ढे में फंसा खड़ा है। आठ बजे तक कुरसेला पहुंचना है , नहीं तो सब बंटाढार”! उसने देखा ‘बंटाढार’ सुनकर जुलमी थोड़ा उदास हो गया था । उसकी उदासी का मतलब वह समझ रहा था । उसके मुँह से निकलने ही वाला था, “ उदास मत हो जुलमी , नकमुन्नी और साड़ी लेकर तू जरूर घर लौटेगा ”, लेकिन वह रुक गया ।

मकुन्दी का साला आठ – दस युवकों के साथ वहाँ पहुँचा। सबने फिर कीचड़ बटोरकर हटाया। तख्ता लगाया । तबतक  ट्रैक्टर लेकर आगे से उसका ड्राइवर भी आया। लोहे के मोटे चेन से उसे बांधकर फंसे ट्रैक्टर को खूब खींचा, लोग धक्के भी लगा रहे थे ।
...आखिर तीसरी कोशिश कामयाब हुई । मकुन्दी की जान में पूरी जान आ गई  । मेहमाननवाजी या चाय – चुक्कड़ के लिए समय नहीं था । पौने सात बज चुके थे । उसने तुरंत सेठ को फिर से फोन लगाया लेकिन वह नहीं उठा रहे थे । मकुन्दी की आशंका थोड़ी बढ़ गई । जुलमी तो सड़क के हिसाब से गाड़ी खूब भगा रहा था लेकिन समय का कांटा आठ की तरफ और तेजी से भाग रहा था ।

जो डर था वही हुआ । सेठ का फोन आया,   “ मकुन्दी जी , अब आने से कोई फायदा नहीं । यहां तो सात बजे से ही इतना माल पहुंच  गया है कि एक्सपोर्टरवाले अब मना कर रहे हैं “। सुनकर सन्न हुआ मकुन्दी फिर भी संभलकर बोला, “ लेकिन सेठ आपने तो आठ बजे तक का समय..., और मेरी गाड़ी भी डोभा के पास डेढ घंटे तक फंसी रही वरना माल लेकर ...सेठ ने फोन कट कर दिया। कहानी सुनने के लिए  समय कहां है ! मकुन्दी बदहवास होकर फोन लगाता रहा लेकिन सेठ काल उठा ही नहीं रहा था।

पक्का सवा आठ बजे जुलमी कुरसेला ठेक गया था। सेठ की गद्दी के आगे छोटी -बड़ी  कम से कम सौ गाड़ियां खड़ी थीं, मक्के की बोरियों से लदी । जुलमी का ट्रैक्टर सबसे पीछे खड़ा था।  इन गाड़ियों की भीड़ में बहुत पीछे ।

सेठ के सामने मकुन्दी  बहुत गिड़गिड़ाया था कि पन्द्रह के भाव से ले लो सेठ ! साढे चौदह ...चौदह भी मंजूर है । शायद वह भूल रहा था बाजार के नियम बड़े निर्मम होते हैं । सेठ ने झिड़कते हुए इतना कहा था , “ अब तो ग्यारह का भी बाजार – भाव नहीं है मकुन्दी ।
मकुन्दी को दोहरा झटका लगा । ग्यारह की तो खरीदी ही थी ।

जुलमी ने भारी मन से कहा,  “ भैया दे दो ग्यारह में । बाद में और कम ... ? आगे वह बोल नहीं पाया था ।
मकुन्दी सोच में पड़ गया । तभी उसका मोबाइल बजा। गुलाबबाग  मंडी से फोन आया, “ साढे ग्यारह तक मंडी में पहुंचो तो तेरह का भाव मिलेगा “। वहाँ के कुछ मंडी व्यापारियों को अभी ही मुंबई से फोन आया था कि एक और ट्रिप के माल का बंदोबस्त कर शाम की मालगाड़ी से कटिहार से रवाना कर दें।

बस क्या था, बिना कुछ खाए – पिए दोनों गुलाबबाग की ओर निकल पड़े।
जुलमी के चेहरे पर मुस्कान लौट आई थी । लेकिन मकुन्दी के मन में अभी भी अंदेशा था ।

ट्रैक्टर की बढ़ती स्पीड देखकर आदतन मकुन्दी बोल उठा, “आराम से जुलमी, जान बचेगी तो  सुतली - डोरी बांटकर खा लेंगे । “ जुलमी थोड़ा डरते हुए मुस्कुराकर बोला, “अब तो प्लास्टिक की रस्सी चलती है मकुन्दी  भैया !” मकुन्दी  को जैसे ठोकर – सी लग गई ।

फिर मोबाइल बजा । अग्रवाल सेठ के यहां से फोन था, “ कहां तक पहुंचे मकुन्दी जी ?  पन्द्रह – बीस मिनट में पहुंचिए तो तेरह का भाव, नहीं तो ग्यारह से ज्यादा नहीं मिलेगा वो भी पैसे दो सप्ताह बाद  । मकुन्दी ने समय देखा और वह फिर मायूस हो गया था । “ लेकिन साढ़े ग्यारह तक पहुँच जाएंगे सेठ ।“ शायद बेसुध  मकुन्दी कटे हुए फोन पर ही बता रहा था।

जुलमी को थोड़ा -थोड़ा  समझ में आ रहा था लेकिन अपने सेठ से पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी। सपने देखना या ख्वाहिश करना जिस मालिक ने सिखाया उसके मुंह से ना या निराशा भरी बातें  सुनना उसे गंवारा नहीं हो रहा था ।

ठीक साढ़े ग्यारह बजे मकुन्दी का माल गुलाबबाग मंडी पहुंचा लेकिन यहां भी वही दृश्य ।
जुलमी अब उम्मीद खो चुका था। । जान पर खेलकर इतने कम समय में माल पहुंचाया लेकिन सब सोड्डा...स्आहा ।
यहां भी अब सेठ साढे दस से ऊपर नहीं जा रहा है । आधा घंटा लेट हो गया था।
मकुन्दी का दिल बैठ गया।
बाबूजी की बात एकाएक याद आ गई, मंडी के लिए चट्टी से उठा माल और विसर्जन के लिए मंदिर से उठी मूर्ति वापस नहीं लाते ।
कलेजे पर पत्थर रखकर साढ़े दस में सेठ की दुकान के सामने ट्रेलर खाली कर दी उसने। पैसा दो सप्ताह बाद ।

ट्रैक्टर पर बैठा जुलमी देख रहा था – मकुन्दी भैया सेठ की दुकान से लौट रहे हैं , हारा हुआ योद्धा जैसे पैर पटकते युद्ध – शिविर में वापस आ रहा हो !

इससे पहले कि मकुन्दी कुछ बोल पाता , जुलमी ने हंसी ओढ़कर कहा, “ भैया , एक बात कहूं ? नकमुन्नी और सिल्क वाली .. सिर्फ मेरे और आपके बीच ही.. , फिकर मत करो, मैंने अपनी घरवाली को तभी से अबतक  कुछ नहीं  बोला इसके बारे में। “
मकुन्दी  थोड़ा रुआंसा हो गया, “ लेकिन मेरी बातों का क्या जुलमी ?
जुलमी बस इतना ही बोल पाया , “ अब अगली खेप में भाईजान ....” । उसकी बातों में संतोष और आशा की जो झलक थी, मकुन्दी उसमें सब कुछ भूलने की कोशिश कर रहा था । उसे अब जोर की भूख लग रही थी ।
ट्रैक्टर सड़क पर चढ़ चुका था । खाली ट्रेलर भी जुलमी को बहुत भारी लग रहा था । पीछे  घाटे का असह्य बोझ ...और आगे गांव की ओर लौटती  वही सड़क ...मकुन्दी को वह गड्ढे  दिख रही थी ...तो जुलमी को रात का नरम- गरम  बिछौना...! □□□

-----------31/08/2018





























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